बिहार का ‘भरोसा’ है ये नेता, जिसके साथ होता है वो बन जाता है ‘बादशाह’

पटना. बिहार के राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसे दूल्हा हैं जिनकी पालकी उठाना सभी राजनीतिक दल चाहते हैं.इसी का नतीजा है कि नीतीश कुमार अब भाजपा से रिश्ता तोड़ चुके हैं लेकिन राजद ने उन्हें तुरंत समर्थन देने की घोषणा कर दी. अब एनडीए से अलग होकर भी नीतीश कुमार फिर से राजद के समर्थन से मुख्यमंत्री रहेंगे.नीतीश को चाहे भाजपा हो या राजद या फिर कांग्रेस सहित अन्य दल उन सबका बेशर्त समर्थन देने का कारण भी बेहद खास है. नीतीश को भले लालू यादव ने कभी पलटूराम कहा था. लेकिन आज जब नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़कर पलटी मारी तो लालू की पार्टी ने ही उन्हें बिहार सरकार का दूल्हा यानी मुख्यमंत्री बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. सत्ता के लिए दो धुर विरोधियों का एक साथ आना अपने आप में बेहद खास है. राजद के लिए एक प्रकार से नीतीश कुमार समर्थन देना मजबूरी भी है. वहीं नीतीश कुमार का नखरा उठाने के बाद भी भाजपा आजतक नीतीश पर हमलावर नहीं हुई इसका कारण भी नीतीश की छवि ही है.दरअसल, बिहार में वर्ष 2005 से सत्ता संभाल रहे नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल को सुशासन नाम दिया है. यानी लालू –राबड़ी राज के दौरान 1990 से 2005 के शासनकाल को जंगलराज नाम दिया गया तो नीतीश ने उसे बदलने का दावा किया. राज्य में कानून का राज स्थापित करने की बात कही. 2005 में सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार ने बिहार की छवि बदलने के लिए पुलिस-प्रशासन को अपराध पर रोक लगाने की खुली छूट दी. राज्य में सड़कों का जल बिछाया. लडकियों के लिए साइकिल योजना और बाद में सात निश्चय के रूप में ऐसी योजनाएं लाई गई जिसे अन्य राज्यों ने भी अपनाया. नीतीश मॉडल का लोहा बिहार से बाहर के राज्यों ने माना.इससे बिहार की छवि को बदलने के साथ ही नीतीश कुमार की खुद की छवि भी बदल गई. वे विकास पुरुष के रूप में अपनी छवि बनाने में सफल रहे. उनके नाम पर ही भाजपा भी राज्य में लगातार मजबूत हुई. भाजपा के किसी नेता की इस स्तर की छवि नहीं बनी जो एनडीए का चेहरा बन पाए. यानी वोट पाने के लिए नीतीश कुमार ही भाजपा के लिए भी विश्वस्त चेहरा रहे. नीतीश की जन स्वीकार्यता का ही नतीजा रहा कि 2005, 2010 और 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने बड़ी जीत हासिल की.वहीं नीतीश के चेहरे के कारण ही 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने जीत हासिल की. तेजस्वी यादव पहली बार उप मुख्यमंत्री बने. लालू यादव को लेकर कई प्रकार के आरोपों के बाद भी 2015 में मिली उस जीत के नायक नीतीश कुमार ही माने गए. नीतीश का ही जादू था कि उस विधानसभा चुनाव में भाजपा लाख कोशिशों के बाद भी सफल नहीं हुई. बाद में जब वर्ष 2017 में नीतीश का लालू से मोहभंग हुआ तब खुले दिल से भाजपा ने स्वागत किया और अपना लिया. एक बार फिर से लालू यादव और तेजस्वी यादव का नीतीश कुमार को अपना लेना यह दर्शाता है कि नीतीश सबके हैं. यानी नीतीश की विकास पुरुष और जन स्वीकार्यता ही है जो उन्हें ऐसा नेता बनाता है कि वे बिहार में ऐसे राजनीतिक दूल्हा हैं जिनकी पालकी सभी पार्टियां उठाने को तैयार है.

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